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FATF की लिस्ट में आएगा पाक का नाम, US और ब्रिटेन ने और बढ़ाई मुश्किल!

नीलू रंजन, नई दिल्ली। हाफिज सईद और उसके संगठनों को आतंकी सूची में डालने के बावजूद पाकिस्तान का बचना आसान नहीं होगा। अमेरिका और ब्रिटेन ने आतंकी फंडिंग के लिए पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) में निगरानी सूची में डालने का प्रस्ताव पेश किया है। यही नहीं, फ्रांस और जर्मनी इसके समर्थन में उतर आया है। निगरानी सूची में आने के बाद पाकिस्तान के लिए दूसरे देशों से कर्ज लेने या व्यापार करने में मुश्किल आएगी। ध्यान देने की बात है कि एफएटीएफ ने अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र से प्रतिबंधित आतंकी संगठनों व व्यक्तियों के वित्तीय लेन-देन पर रोक नहीं लगाने का दोषी बताया था।

पाकिस्तान में डर साफ देखा जा सकता है। हाफिज सईद और उसके संगठनों को आतंकी सूची में डालने के पाकिस्तान के फैसले को इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के लिए एफएटीएफ से बचना आसान नहीं होगा। पाकिस्तान के खिलाफ आतंकी फंडिंग को लेकर पुख्ता सबूत हैं।

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ऐसे कसा पाकिस्तान पर शिकंजा

दरअसल पिछले साल स्पेन में 18 से 23 जून के बीच हुई एफएटीएफ की प्लेनरी बैठक में पाकिस्तान में आतंकी संगठनों को मिल रही फंडिंग पर रिपोर्ट पेश की गई थी। जिसमें पाकिस्तान को आतंकी फंडिंग का दोषी ठहराया गया था। इसके बाद पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई का मामला इंटरनेशनल कोआपरेशन रिव्यू ग्रुप (आइसीआरजी) को सौंप दिया। बाद में आइसीआरजी ने एशिया पैसिफिक ग्रुप (एजीपी) को एक महीने के भीतर तक पाकिस्तान द्वारा आतंकी फंडिंग रोकने के लिए उठाए गए कदमों की रिपोर्ट देने को कहा था। एजीपी के रिपोर्ट नहीं देने की स्थिति में आइसीआरजी ने पाकिस्तान को सीधे उसे रिपोर्ट देने को कहा कि उसने आतंकी फंडिंग रोकने के लिए क्या उपाय किया है। लेकिन पाकिस्तान ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। आतंकी फंडिंग पर पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए अमेरिका और ब्रिटेन ने उसे निगरानी सूची में डालने का प्रस्ताव पेश कर दिया है। इस पर 18 से 23 फरवरी के बीच फ्रांस में होने वाली एफएटीएफ की बैठक में विचार किया जाएगा। फ्रांस और जर्मनी के समर्थन में आने के बाद इस प्रस्ताव का पास होना सुनिश्चित माना जा रहा है।

पाकिस्तान के लिए कर्ज लेना भी हो जाएगा मुश्किल

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वैसे तो एफएटीएफ को किसी भी देश के साथ आर्थिक लेन-देन प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं है। लेकिन एक बार निगरानी सूची या प्रतिबंधित सूची में आने के बाद आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहे पाकिस्तान के लिए दुनिया में कहीं भी कर्जा लेना कठिन हो जाएगा। कर्ज मिलेगा भी तो काफी मंहगा मिलेगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियां पाकिस्तान में या वहां की कंपनियों से कारोबार करने से हिचकेंगी। यही नहीं, आतंकवाद को लेकर संवेदनशील देश इसके आधार पर पाकिस्तान के साथ आर्थिक लेन-देन रोक भी सकते हैं। यही डर पाकिस्तान को कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर रहा है।

भारत ने 2016 में उठाया था मुद्दा

दरअसल पाकिस्तान लंबे समय तक दुनिया को दिखाने की कोशिश करता रहा है कि वह खुद आतंकवाद से पीड़ित है और उसे खत्म करने के लिए सारे प्रयास कर रहा है। लेकिन भारत ने अक्टूबर 2016 में एफएटीएफ में पाकिस्तान में आतंकी संगठनों को हो रही भारी फंडिंग का मुद्दा उठाया था। भारत का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र संघ से अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों की सूची में डाले गए लश्करे तैयबा, जमात उत दावा और जैश ए मोहम्मद के आतंकी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं और आतंकी हमलों के लिए फंड इकट्ठा कर रहे हैं। इसके लिए भारत ने कई दस्तावेज भी प्रस्तुत किये थे। भारत के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए एफएटीएफ ने इसकी जांच का फैसला किया और एशिया पैसिफिक ग्रुप को इस पर तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा। लेकिन, एशिया पैसिफिक ग्रुप के सदस्यों को पाकिस्तान प्रभावित करने में सफल रहा है और रिपोर्ट तैयार नहीं होने दी। भारत ने फरवरी 2017 में एफएटीएफ की बैठक में फिर यह मुद्दा उठाया तो पाकिस्तान की ओर से इसका तीखा विरोध हुआ। पाकिस्तान की कोशिश थी कि इस मुद्दे को तकनीकी पहलुओं में उलझा दिया जाए। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय देशों के भारत के प्रस्ताव पर मिले समर्थन से पाकिस्तान की मंशा सफल नहीं हो सकी।

By Manish Negi

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