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पारसी अंजुमन ट्रस्ट कठोर न बने, दूसरे धर्म में विवाहित महिला को टावर ऑफ साइलेंस जाने दे : सुप्रीम कोर्ट

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  1. दूसरे धर्म में स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने वाली महिला की याचिका
  2. हाई कोर्ट का आदेश, पारसी महिला अन्य धर्म में शादी करके पारसी नहीं रह जाती
  3. याचिकाकर्ता पारसी महिला गुलरख गुप्ता ने हिंदू से शादी की है

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वलसाड पारसी अंजुमन ट्रस्ट से कहा है कि वे कठोर न बनें और पारसी धर्म से बाहर शादी करने करने वाली पारसी महिला को पिता की मृत्यु पर प्रार्थना के लिए टावर ऑफ साइलेंस जाने की इजाजत देने पर विचार करें. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने ट्रस्ट से कहा कि कठोरता धर्म के सिद्धांत को समझने के लिए हमेशा सही नहीं होती.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला प्रार्थना के लिए जाना चाहती है, इसके लिए याचिका क्यों? ट्रस्ट से कोर्ट ने कहा कि वह इस पर अगले हफ्ते अपना रुख कोर्ट को बताए. अगर यह मुद्दा सुलझ जाता है तो एकेडमिक मामले में क्यों जाना हो? मामले की 14 दिसंबर को अगली सुनवाई होगी.
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सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को इस मामले में तय करना है कि क्या पारसी महिला किसी दूसरे धर्म के पुरुष से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने के बाद अपने धर्म का अधिकार खो देती है? गुलरख गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके गुजरात हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि पारसी महिला अपने धर्म का अधिकार खो देती है जब वह किसी दूसरे धर्म के पुरुष से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करती है. इतना ही नहीं हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि अब आप पारसी नहीं रहीं भले ही आपने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी की है.
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गुलरख गुप्ता ने अपनी याचिका में कहा है कि वे पारसी हैं लेकिन उन्होंने हिंदू से शादी की है. उनके पिता 80 साल के हैं. उन्हें पता चला कि अगर पारसी महिला दूसरे धर्म में शादी कर ले तो उसे पति के धर्म का ही मान लिया जाता है और पारसी मंदिर में पूजा के अलावा अंतिम संस्कार के लिए पारसियों के टावर ऑफ साइलेंस में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता. इसके बाद उन्होंने पारसी ट्रस्टियों से बात की तो कहा गया कि वे अब पारसी नहीं रहीं. स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पति के धर्म में परिवर्तित हो गई हैं. महिला इस मामले को लेकर गुजरात हाईकोर्ट गई लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. इसके बाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
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हालांकि पारसी पंचायत की दलील थी कि यह स्पेशल मैरिज एक्ट का मामला नहीं बल्कि पारसी पर्सनल लॉ का है और यह करीब 35 साल पुरानी प्रथा है. इस संबंध में सारे दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं.
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